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एक बार फिर डॉक्टरों की लापरवाही आई सामने, कोटा अस्पताल में 77 बच्चों की हुई मौत

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जहाॅं एक तरफ राजस्थान सरकार गाँवों जैसे सुदूर इलाकों तक पहुँचने के लिए “निरोगी राजस्थान” जैसे कार्यक्रम शुरू कर रही है वहीं दूसरी ओर कोटा जैसे शहर में एक महीने में 77 बच्चों की मौत हो गई है। इस महीने के पिछले 24 दिनों में कोटा के जेके लोन अस्पताल (JK Lon hospital) में 77 बच्चों की मौत हुई है जिनमे से 10 मौतें पिछले 48 घंटों में रिपोर्ट की गईं हैं। अस्पताल में जांच करने के लिए रविवार को एक समिति का गठन किया था, जिसके बाद अस्पताल के कर्मचारियों ने लापरवाही से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि संसाधन और उपकरण ठीक से काम कर रहे थे।

डाॅक्टर रिपोर्ट्स की माने तो अस्पताल ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में मरने वाले 10 बच्चे बेहद गंभीर और वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे। अस्पताल ने यह भी दावा किया कि 23 और 24 नवंबर को जन्म लेने वाले पांच नवजात शिशु सिर्फ एक दिन के थे और भर्ती होने के कुछ घंटों बाद ही उनकी सांसे रूक गई। डाॅक्टरस की रिपोर्ट में कहा गया है कि वे बच्चे हाइपोक्सिक इस्केमिक एन्सेफैलोपैथी (Hypoxic Ischemic Encephalopathy) से पीड़ित थे, एक ऐसी स्थिति जिसमें शिशु के मस्तिष्क को पर्याप्त ऑक्सीजन और सेप्टिसीमिया नहीं मिलता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि गंभीर निमोनिया के कारण 23 दिसमबर को एक पांच महीने के बच्चे की मौत हो गई और एक सात साल का बच्चा एक्यूट श्वसन संकट सिंड्रोम (Acute Respiratory Distress Syndrome) से मर गया। इसके अलावा 24 दिसंबर को एक दो महीने के बच्चे की मृत्यु का कारण गंभीर निमोनिया बतया गया और एक डेढ़ साल के बच्चे की मृत्यु की वजह जब्ती विकार (Seizure Disorder) बताई गई। जबकी वास्तव में सूत्रों से ये सामने आया है कि सभी 10 मौतें सामान्य थीं और इन बच्चों के मरने का कारण सिर्फ और सिर्फ अस्पताल की लापरवाही है। 2014 में अस्पताल ने 1,198 मौतों की सूचना दी जबकि 940 मौतें इस साल 24 दिसंबर तक दर्ज की गई हैं। राष्ट्रीय एनआईसीयू (National NICU) के रिकॉर्ड के अनुसार शिशु की 20 प्रतिशत मौतें स्वीकार्य हैं जबकि कोटा में मृत्यु 10 से 15 प्रतिशत होती है । यहां रोजाना एक से तीन शिशुओं की मौत होती है।




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